उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…
ये लिखते हुए बेहद दुख हो रहा है कि उर्दू अदब और भारतीय साहित्य, सिनेमा के शिखर पुरुष, पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र साहब का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। बशीर बद्र साहब ने अपनी लिखी इस नज़्म की तरह ही, चलते-चलते अपनी शायरी का, यादों का कभी न बुझने वाला उजाला हमारे दिलों में छोड़ दिया है।
वह केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि वे आम बोलचाल की जुबान में सबसे गहरी मानवीय संवेदनाओं को पिरोने वाले जादूगर थे। उन्होंने मुश्किल शब्दों के बंद कमरों से शायरी को आज़ाद कर उसे आम आदमी की धड़कन बना दिया। उनके शेरों की सादगी में जो बेमिसाल ताक़त और रूहानी खूबसूरती थी, उसने हर पीढ़ी के दिलों को छुआ। जब वे लिखते हैं—
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
या
यूँही बे-सबब न फिरा करो
कोई शाम घर में रहा करो
…. तो वो महज़ शब्द नहीं रह जाते, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के सुख-दुख और फलसफे की आवाज़ बन जाते हैं। इस तरह के उनके तमाम शेर हैं जो एक लंबे अरसे से हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बेहद सहजता से घुलेमिले हैं या सुने-सुनाए जाते रहे हैं, बगैर हमारे जाने कि ये बेहतरीन लाइनें उन्ही की कलम से निकली हैं… और यही एक रचनाकार की सबसे बड़ी मकबूलियत है।
बशीर बद्र साहब का रिश्ता सिनेमा और संगीत से बेहद करीबी रहा। उनके लिखे अमर गीतों और ग़ज़लों को जब ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह, पंकज उधास और तलत अज़ीज़ जैसे उस्तादों ने अपनी आवाज़ दी, तो वो संगीत के इतिहास का अमूल्य हिस्सा बन गए।
अदब और सिनेमा के इस महान रचनाकार को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि। बशीर बद्र साहब, आज भले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें, खामोशियाँ और उनके रचे ये शब्द आने वाली सदियों तक प्रेम-तन्हाई और धूप-छांव भरे ज़िंदगी के रास्तों को रौशन करते रहेंगे।
उन्ही के लफ्ज़ों में…
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी…
(न्यू दिल्ली फ़िल्म फाउंडेशन के फेसबुक पेज से साभार)